
बांग्लादेश की राजनीति इन दिनों सिर्फ सत्ता के संघर्ष का अखाड़ा नहीं, बल्कि इतिहास का काला अध्याय भी बनती जा रही है।
पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना, जो कभी लोकतंत्र की मुखर आवाज मानी जाती थीं, आज उन्हीं पर 1,400 लोगों की मौत का आरोप है। और अब अंतरिम सरकार ने उनके लिए सीधे मौत की सज़ा की मांग कर डाली है।
छात्र प्रदर्शन से शुरू हुआ था बवाल
पिछले साल बांग्लादेश में छात्रों के नेतृत्व में बड़ा विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ था, जिसमें शिक्षा सुधार, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार को लेकर लोग सड़कों पर उतरे।
लेकिन यह आंदोलन अचानक इतिहास की सबसे हिंसक घटनाओं में बदल गया। 1,400 से अधिक लोगों की जान चली गई — प्रदर्शनकारी, आम नागरिक और कुछ सुरक्षाकर्मी भी। और अब आरोप लग रहे हैं कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे हसीना सरकार की “ऑर्डर टू किल” नीति काम कर रही थी।
ऑडियो लीक और ऑर्डर की गूंज
हाल ही में एक लीक हुई ऑडियो क्लिप ने इस मामले को और भी गरमा दिया। इसमें कथित तौर पर शेख़ हसीना सुरक्षाबलों को घातक हथियार इस्तेमाल करने का आदेश देती सुनाई देती हैं। हालांकि, हसीना ने सभी आरोपों को नकारते हुए इसे “राजनीतिक साज़िश” करार दिया है। फिलहाल वह भारत में शरण लिए हुए हैं — जहां उनका राजनीतिक भविष्य, और संभवतः सुरक्षा भी, बहुत कुछ अधर में लटका है।
“एक मौत की सज़ा काफी नहीं है…”
बांग्लादेश के सरकारी वकील ताजुल इस्लाम का बयान भी कम चौंकाने वाला नहीं था। उन्होंने कहा, “हसीना को 1,400 मौत की सज़ाएं मिलनी चाहिए। लेकिन चूंकि इंसानी तौर पर यह संभव नहीं है, इसलिए कम से कम एक बार मौत की सज़ा की मांग हम कर रहे हैं।”
राजनीतिक बदला या इंसाफ़ की मांग?
ये मुक़दमा कहीं न कहीं राजनीतिक प्रतिशोध की बुनियाद पर भी टिका हो सकता है। लेकिन 1,400 लोगों की मौत के बाद इंसाफ की उम्मीद को भी खारिज नहीं किया जा सकता।

अब देखना ये है कि ये मामला इंटरनेशनल कोर्ट तक जाएगा? भारत हसीना को डिपोर्ट करेगा? या फिर अगला चैप्टर चुनावी मंच से लिखा जाएगा?
राजनीति में जब “सत्ता” से “सज़ा” तक का सफर हो
बांग्लादेश में जो चल रहा है, वो केवल एक राजनीतिक टकराव नहीं, लोकतंत्र, मानवाधिकार और न्याय के सिद्धांतों की भी परीक्षा है।
शेख़ हसीना, जो कभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर महिला सशक्तिकरण और स्थिरता की मिसाल बनीं, अब मौत की सज़ा के अभियुक्त के रूप में चर्चा में हैं।
राजनीति में वक़्त कब किसे नायक से खलनायक बना दे — यह बांग्लादेश हमें फिर से याद दिला रहा है।
“सोया मत लो, नहीं तो फूट पड़ जाएगी!” — ट्रंप का चाइना पर सोयाबीन वार!
